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युधिष्ठिर का कुत्ता – दूसरी किश्त

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 2, 2010

हरिशंकर राढ़ी

यह भी एक शाश्वत सत्य है कि अपनी जाति एवं समाज की चिन्ता करने वाला कभी भी व्यक्तिगत विकास नहीं कर पाता है। यदि अपनी जाति के स्वाभिमान की चिन्ता मैं ही करता तो आज स्वर्ग पहुँच पाने वाला इकलौता आदरणीय कुत्ता नहीं बन पाता। मैं भी किसी पुरातन समाजवादी की भांति इधर-उधर के धक्के खाकर अबतक मर चुका होता या अज्ञातनामा जिन्दगी जी रहा होता। स्वर्ग का सुख शोषित समाज का साथ देकर नहीं पाया जा सकता और न ही अपनी जाति का अपकार करने वाले के प्रतिशोध की भावना रखकर। स्वर्ग का सुख या तो ऐसे लोगों की शरण में जाकर पाया जा सकता है या फिर अपनी जाति के लोगों को स्वर्ग का सपना दिखाकर। कम से कम लोकतंत्र में तो ऐसा ही होता है।
इस तथ्य के प्रमाण में आपको मुझसे अच्छा दूसरा उदाहरण नहीं मिल सकता है। मैं उसी युधिष्ठिर का घोर समर्थक रहा जिन्होंने धर्मराज होने के बावजूद मेरी पूरी जाति के लिए सदैव के लिए नंगा कर दिया । मुझे मालूम था कि धर्मराज ने मेरी जाति को खुले यौन सम्बन्ध का श्राप दिया है क्योंकि मेरे एक भाई की वजह से उन पति -पत्नी के निजी संबंधों में विघ्न पड़ा था। बड़ा आदमी सब कुछ बर्दाश्त कर लेगा किन्तु यौन सम्बन्धों में विघ्न बर्दाश्त नहीं कर सकता । आपको स्मरण होगा कि मेरे एक भाई ने स्वभाववश उस समय उनका जूता ( और ये जूता उनके लिए रतिक्रीडा का साक्षी हुआ करता था) इधर-उधर कर दिया था। अब कोई शक्तिशाली व्यक्ति अपने प्रति किए गए अपराध का दंड केवल दोषी को तो देता नहीं, उसकी नजर में तो अपराधी की पूरी जाति ही दोषी होती है और फिर दंड पूरे समाज को मिलता है। लो भाई, श्राप मिल गया कि तुम्हारी जाति का यौन सम्बन्ध सभी लोग देखें। बिल्कुल लाइव टेलीकास्ट ! पता नहीं कुछ लोगों को खुले यौन सम्बन्धों से इतना लगाव क्यों होता है ? अवसर तलाशते रहेंगे कि कोई रतिक्रीडारत हो और हम नेत्रसुख लें। उन्हें तो अपनी भावी पीढ़ी की भी चिन्ता नहीं होती कि उनके इस आनन्द का बालमन पर क्या प्रभाव पड़ेगा !
खैर , मुझे आजे इस बात का संतोष है कि जिस प्रकार का श्राप हमें मिला था, उसी प्रकार का कार्य आज मानव जाति भी करने लग गई है। उनका खुलापन देखकर मन को शांति मिलती है। भविष्य में जब वे यौन संबन्धों में पूरी तरह हमारा अनुसरण करने लगेंगे तो हमारे श्राप का परिहार हो जाएगा। अगर विकास ऐसे ही होता रहा तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं है।
मानिए तो मैं किसी भी प्रकार युधिष्ठिर से कम धर्मपारायण नहीं हूँ। किसी भी परिस्थिति में मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और न कभी उनका विरोध किया। यहाँ तक कि उनके भाइयों ने भी समय पडने पर उनको भला -बुरा कहने में कसर नहीं रखी । उनपर आरोप भी लगाया । वैसे आरोप तो आप भी लगाते रहते हैं – धर्मराज ने ये किया ,धर्मराज ने वो किया। अमुक बात के लिए इतिहास धर्मराज को कभी क्षमा नहीं करेगा और अमुक बात का जवाब उन्हें देना ही होगा।उन्होंने द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया। सारे नारीवादी आज चीख- चीखकर इस बात का जवाब माँग रहे हैं। वैसे जवाब क्या मांग रहे हैं, अंधेरे में पत्थर मार रहे हैं। उनकी भी अपनी समस्याएं और आवश्यकताएं हैं। अगर इतना चीख लेने से कुछ नारियाँ प्रभाव में आ जाएं तो बुरा ही क्या है? किसी ने यह प्रश्न नहीं उठाया कि धर्मराज ने अपने सगे भाइयों को भी तो दाँव पर लगाया था, इसका उन्हें क्या अधिकार था ? पर इस प्रश्न से कोई स्वार्थ नहीं सधता , कोई आन्दोलन नहीं बनता ।
आज तक तो धर्मराज ने ऐसी किसी बात का जवाब नहीं दिया। क्यों दें ? स्वर्ग में बैठा हुआ एक महान इंसान धरती पर कीड़े -मकोड़ों की भांति जीने वाले प्राणी की बात का जवाब क्यों दे ? सारे लोकतंत्र और राष्ट्र संघ के दबाव के बावजूद आप पडोसी मुल्क से एक अपराधी का प्रत्यर्पण तो करा ही नहीं सकते और चाहते हैं कि धर्मराज स्वर्गे से कूदकर तुम्हारे बीच उत्तर देने आ जाएं ! अनगिनत द्रौपदियों और बंधु-बांधवों को दाँव पर जगाने वाले हजारों लोग तुम्हारे बीच में ही हैं। इन्होंने आजतक कोई जवाब दिया है क्या ? इन नारीवादियों से पूछो कि साझा सम्पत्ति की रक्षा वे कितने मन से करते हैं ? क्या वे इतना भी नहीं जानते कि साझे की खेती तो गदहा भी नहीं चरता । बिना श्रम के मिली सम्पत्ति के लुटने पर कितना दर्द होता है ? चले हैं धर्मराज पर आराप लगाने !पर, वह आदमी ही क्या जो दूसरों पर आरोप न लगाए !
धर्मराज स्वर्ग जाने के अधिकारी थे। उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला था। आप कह सकते हैं कि झूठ तो नकुल सहदेव ने भी नहीं बोला था। और भी बहुत से लोग हैं जो झूठ नहीं बोलते । परन्तु आप इस बात पर विचार नहीं कर रहे कि वे सम्राट थे । ऐसा पहली बार हो रहा था कि एक सम्राट झूठ नहीं बोल रहा था। राजनीति में तो एक टुच्चा आदमी और एक छोटा मंत्री भी झूठ बोले बिना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता । इस प्रकार उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया था। नकुल – सहदेव या किसी सामान्य प्रजाजन के झूठ या सच बोल देने से क्या बिगड जाता है ? आप को याद होगा कि नरो-कुंजरो वाले मामले में झूठ का एक पुट आ जाने से क्या से क्या हो गया था ? एक राजा सच बोलकर कई बारी बड़ी हानि उठा लेता है। अब एक नॉन वीआईपी सच बोलकर क्या नुकसान कर लेगा ? आचरण तो बड़े लोगों का ही देखा जाता है और पुरस्कार भी बड़े लोगों को ही मिलता है। मुझे तो लगता है कि आप पति- पत्नी के बीच लड़ाई शांत कराने वाले को शांति का नोबेल पुरस्कार दिलाना चाहते हैं ।

इधर जब से राजतंत्र का पतन होना शुरू हुआ है और प्रजा तंत्र का आविर्भाव हुआ है, कुत्तों का बोलबाला हो गया है। हमारी यह विशेषता होती है कि हम एक स्वर में अकारण हंगामा कर सकते हैं और भीड़ जमा कर सकते हैं । अगर हम भौंकने लग जाएं तो अच्छी से अच्छी बात भी दब जाती है और प्रजातंत्र में सत्ता और सफलता का यही राज है। हमारे साथ तो यह भी साख है कि हम किसी पर भौंक दें तो उसे चोर मान लिया जाता है। दूसरी बात यह है कि हमारी घ्राण शक्ति इतनी तेज है कि हम खाद्य पदार्थ की किसी भी सम्भावना का पता लगा लेते हैं और सम्भाव्य स्थल पर तत्काल जुट भी जाते हैं। हमारी सफलता में इस शक्ति का भी बहुत बड़ा हाथ है।
हम एक और चीज में आदमियों से बेहतर हैं और वह यह है कि हम देशी- विदेशी में भेदभाव नहीं करते। कुत्ता देशी हो या विदेशी ,हम उस पर बराबर ताकत से भौंकते हैं। हमारे यहाँ का तो पिल्ला भी विदेशी बुलडॉग और हाउण्ड पर भौंकने से नहीं चूकता । ये बात अलग है कि जब अपनी औकात कम देखता है तो सुरक्षित दूरी बनाकर भौंकता है। पर यहाँ के आदमियों के साथ ऐसी बात नहीं है। वे विदेशी को सदैव ही अपने से बेहतर मानते हैं । कई तो विदेशी भिखमंगों को भी हसरत की निगाह से देखते हैं और उनकी आलोचना के विषय में सोच भी नहीं सकते। उन्हें तो शासन करने तक का मौका प्रदान कर दिया ।
वैसे कई लोग अब तक यही मानते हैं कि स्वर्ग में रहने वाला कुत्ता मैं इकलौता हूँ। यह तो अपना – अपना भाग्य है। आज भी ऐसे कुत्तों की संखया मनुष्यों से ज्यादा है जो स्वर्ग में रह रहे हैं, वातानुकूलित विमानों में पूँछ निकाल कर घूम रहे हैं, इन्द्र के नन्दन कानन की हवा ले रहे हैं , देशी -विदेशी गायों का दूध पी रहे हैं और न जाने कितनी उर्वशियों , रम्भाओं और मेनकाओं की गोद में खेल रहे हैं।

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उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुक वाद – दूसरी किश्त

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 27, 2010

हरिशंकर राढ़ी
माना कि प्रो० मटुकनाथ से पूर्व और उनकी उम्र से काफी अधिक या यूँ कहें कि श्मशानोंमुख असंखय प्राध्यापकों ने ऐसा या इससे भी ज्यादा पहले किया था, किन्तु वे इसे आदर्श रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाए थे।उनके अन्दर न तो इतना साहस था और न ही क्रान्ति की कोई इच्छा।जो भी किया , चुपके से किया। छात्राओं के सौन्दर्य एवं कमनीयता का साङ्‌गोपांग अध्ययन किया, गहन शोध किया और अपनी गुरुता प्रदान कर दी । प्रत्युपकार भी किया, पर चुपके- चुपके।आज न जाने कितनी पीएचडियाँ घूम रही हैं और न जाने कितने महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज्ञान बांटकर पैसे और इज्जत बटोर रही हैं, देश की बौद्धिक सम्पदा की प्रतीक बनी बैठी हैं।ये बात अलग है कि गुरुजी ने कितना बड़ा समझौता शिक्षा जगत से किया, कितना बड़ा पत्थर सीने पर रखा , ये वही जानते हैं। पर मन का क्या करें? अब वे भी उदार भाव से पीएचडी बाँट रही हैं। प्रोफेसर साहब की असली शिष्या जो ठहरीं!
पर दाद देनी होगी अपने प्रोफेसर मटुकनाथ जी को जिन्होंने इस तरह के गुमशुदा एवं निजी संबन्धों को मान्यता प्रदान की और मटुकवाद स्थापित किया। उनको एक उच्च दार्शनिक की श्रेणी में रखना चाहिए।इस तरह का साहसिक निर्णय कोई दार्शनिक ही कर सकता है। ये बात अलग है कि ऐसे लोगों को दुनिया पागल मान लेती है। हालांकि प्रेमी, पागल और दार्शनिक में कोई मूल अन्तर नहीं होता। सुकरात को जहर दे दिया और अरस्तू की छीछालेदर में कोई कसर नहीं छोड़ी । इतने दिनों बाद ही हम उनकी बात जैसे -तैसे समझ पाए हैं।मार्क्सवाद ,लेनिनवाद को ले लीजिए, कितने दिनों बाद जाकर इसे प्रतिष्ठा मिली! अपने मटुकनाथ ने भी कोई कम प्रताडना नहीं झेली। लोगों ने चेहरे पर कालिख पोती, चरण पादुकाओं का हार भी पहनाया पर इस महात्मा के चेहरे पर शिकन नहीं आई। प्रेम पियाला पीने वाला इस दुनिया की परवाह करता ही कब है ? मीरा ने तो जहर का प्याला पी लिया था।
सर्वमान्य तथ्य तो यह है कि मनुष्य अधेड़ावस्था के बाद ही स्त्रीदेह के सौन्दर्य को आत्मसात कर पाता है, ठीक वैसे ही जैसे वास्तविक शिक्षा विद्यार्थी जीवन के बाद ही प्राप्त होती है।विद्यार्थी जीवन में तो मनुष्य परीक्षा पास करने के चक्कर में रट्टा मारता ही रह जाता है, अर्थ समझ में ही नहीं आता! अधेड ावस्था से पूर्व तो वह एक्सपेरिमेन्ट के दौर से ही गुजरता रह जाता है। गंभीरता नाम की कोई चीज होती ही नहीं, बस भागने की जल्दी पड़ी होती है।ऐसी स्थिति में एक नवयुवक किसी नवयौवना को क्या खाक समझेगा ? कमनीयता की उसे कोई समझ ही नहीं होती! जब तक वह समझदार होता है, सहधर्मिणी में खोने लायक कुछ बचा ही नहीं होता। अतः पचास पार की उम्र में ही वह एहसास कर पाता है कि किशोरावस्था पार करती छात्रा वास्तव में होती क्या है ? मटुकवाद की गहराई में जाएं तो अर्थ यह निकलता है कि ऐसी छात्रा एकदम नई मुद्रित पुस्तक का मूलपाठ होती है- बिना किसी टीका-टिप्पणी एवं अंडरलाइन की! अब उसका अर्थबोध, भावबोध एवं सौन्दर्यबोध तो कोई अनुभवी प्राध्यापक ही कर सकता है, एक समवयस्क छात्र नहीं जिसका उद्देश्य गाइडों एवं श्योर शाट गेस्सपेपर से शार्टकट रट्टा मारकर परीक्षा पास करना मात्र है।
गुरूजी इतना कुछ करके दिखा रहे हैं।लर्निंग बाइ डूइंग का कान्सेप्ट लेकर चल रहे हैं। प्रेम करने की कला छात्र उनसे निःशुल्क प्राप्त कर सकते हैं । परन्तु वे अनुशासनहीन होते जा रहे हैं। प्रोफेसर साहब के खिलाफ ही हंगामा खड़ा कर दिया। मजे की बात यह कि बिना शिकायत के ही पंचायत करने आ गए। छात्राजी की शिकायत बिना ही संज्ञान ले लिया। अपने यहाँ तो पुलिस और प्रशासन भी बिना शिकायत कार्यवाही नहीं करते। हकीकत तो यह है कि शिकायत के बाद भी कार्यवाही नहीं करते और एक ये हैं कि बिना शिकायत ही दौड़े चले आ रहे! शायद यह सोचा होगा कि उनके हिस्से की चीज गुरूजी ने मार ली, वह भी इस आउटडेटेड बुड्‌ढे ने!

अब इन मूर्ख शिक्षार्थियों को कौन समझाए कि आखिर वो बेचारी मिस कूली अकेली क्या करती । सारी की सारी शिक्षर्थिनियाँ तो गर्लफ्रेण्ड बन चुकी थीं , वही बेचारी अकेली बची थी। तुम्हें तो फ्लर्ट करने से ही फुरसत नहीं! वैसे भी समलैंगिकता को मान्यता मिलने के बाद तुम्हें लड़कियों मे कोई इन्टरेस्ट नहीं रह गया है। तुम्हारे भरोसे तो वह कुँआरी रह जाती ! लेस्बियनपने का लक्षण न दिखने से वैसे ही पुराने एवं संकीर्ण विचारों की लगती है। ऐसी दशा में उसे पुरानी चीजें ही तो पसन्द आतीं और उम्र में तिगुने गुरूजी पसन्द आ गये तो हैरानी किस बात की।
असमानता तो बस उम्र की ही है। इतिहास भी असमानता की स्थिति में ही बनता है।प्रो० साहब उम्र और ज्ञान में बिलकुल ही भिन्न हैं तो इतिहास बना कि नहीं? शिक्षार्थी गण , अगर आप में से कोई मिस कूली को हथिया लेता तो क्या आज शिक्षा के क्षेत्र में मटुकवाद का आविर्भाव होता ?
मानिए न मानिए, मिस कूली बहुत ही उदार, ईमानदार एवं गुरुभक्त है। समर्पण हो तो ऐसा ही हो! कहाँ एक तरफ गुरू का कत्ल करने वाले आज के शिष्य गण और कहाँ गुरु को इतना प्यार करने वाली शिष्या! गुरुऋण से मुक्ति पा लिया।अब अगर गुरु ही ऋण में पड जाए तो पड़े । बिना दहेज ही सेटेल्ड पति पा लिया, वर्तमान पगार से लेकर निकट भविष्य में मिलने वाली पेंशन का अधिकार भी सहज ही मिल गया, इस जमाने में ऐसा भाग्य सबका कहाँ ? ज्ञानियों ने कहा है कि शादी उससे मत करो जिसे तुम प्यार करते हो बल्कि उससे करो जो तुम्हें प्यार करता हो। तुम्हारा क्या, तुम तो किसी से प्यार कर सकते हो!वह तो अपने हाथ में है।

युगों से शिक्षा जगत नीरसता का रोना रो रहा है। शिक्षाविदों के हिसाब से शिक्षा व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करती है। यहां शिक्षा केवल सूचनाओं का संकलन मात्र बनकर रह गई है। करने के नाम पर कुछ रह ही नहीं गया है।सृजन का कोई स्कोप ही नहीं रहा। बड़े-बड़े शिक्षाविद भी भारतीय शिक्षा को रोचक नहीं बना पाए। शैक्षिक अनुसंधान परिषद् सिर पटकते रह गए परन्तु लर्निंग ज्वॉयफुल बन ही नहीं पाई।कम्प्यूटर , खेल, संगीत एवं कार्य शालाएं सफेद हाथी ही सिद्ध हुए।पोथी पढि -पढि जग मुआ। पर , अपने मटुकनाथ मिस कूली से मिलकर एक ही झटके में शिक्षा को रोचक एवं उद्देश्य पूर्ण बना दिया।ज्ञानयोग एवं प्रेमयोग का अनूठा संयोग शिक्षा को मृगमरीचिका से बाहर लाया।बुजुर्ग एवं युवा पीढ़ी का मिलन हो गया। जेनरेशन गैप की अवधारणा निर्मूल सिद्ध होने लगी। शिक्षक एवं शिक्षर्थिनियाँ एक दूसरे के हो गए। पुरानी वर्जनाएँ टूट गई। शिक्षा में यह एक नए युग का सूत्रपात है। माना कि कुछ लोग विरोध में भी हैं, पर विरोध किस वाद का नहीं हुआ है ? पोंगापंथी कब नहीं रहे ? पर हाँ, यदि हमें एक सम्पूर्ण विकसित देश बनना है और पाश्चात्य जगत को टक्कर देनी है तो मटुकवाद को समर्थन देना ही होगा।

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