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Archive for the ‘you’ Category

अनकही खामोशियां

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 5, 2009

अपने अक्ष पर घुमती हुई पृथ्वी कभी स्थिर हो सकती है….? फिर मैं कैसे……..??
मैं तो घूमता रहा और थकता रहा…..
अनकही खामोशियों में तुम थी…
नींद मर्ज है…यह कहकर तुने मुझे सुला दिया……
कई छोटे छोटे अनु-सपने आते-जाते रहे…
मैं नींद में बेशुध रहा…गहरी नींद…अति गहरी…
न जाने कब सपनों ने भी आना छोड़ दिया…..
नर्म मुलायम नींद में डूबते हुये अंतिम नींद तक सोया….सारी थकान जाती रही…
सुबह बारिश के झोंके पृथ्वी पर बरस रही थी…
बादल के गुच्छे मूड में थे…बस बरसे जा रहे थे…
आंख खुलने से पहले तुमने कुछ कहा…फिर ओझल हो गई….
रात की दुपहरिया में खजुराहो पीछे छूट गया था…
अनकही खामोशियों से गुजरते हुये…मैं इनमें अर्थ तलाशता रहा…
अर्ध चेतना में तो तुम भी थी…और मैं भी…
बेहतर होता बिना मंजिल के भटकना….या फिर पूर्ण चेतना में होना…..
अनकही खामोशियों में क्या था…..? कोई ठहरी हुई सी चीज….या फिर ठहराव के नीचे कोई बहती हुई सी चीज….??
पृथ्वी के साथ तुम भी मेरी आंखों में घुम रही हो…….अनकही खामोशियों की तरह।

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अनवरत तलाश

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 4, 2009

मीलों आगे चलते हुये अनवरत तलाश
…अंधरे पथ को टटोलने की कोशिश…मंजिल का पता नहीं…सुबह कोसों दूर।
बादलों से घिरा आससान, रिमझिम बूंदे,
फिजा में फैली हुई धरती की सोंधी महक,
घने वृक्ष के तले लुप्त होती चेतना,
रहस्यों के कोहरे को चीर कर बढ़ते मेरे कदम।
घुमावदार पर्वत की नमी, उससे टकराकर लौटती खुद की सांस,
अतल गहराई और उसमें उतरने की अदम्य इच्छा…चेतन पर अचेतन का कब्जा।
बौने होते अब तक के सींचे गये विचार,
उभरें पर्वतों के उस ओर देखने की कोशिश
…व्यर्थ…!व्यर्थ…!!व्यर्थ…!!!अंधेरे में पसरी मौन आवाज,
सुरमई गहराईयों में डूबना….बस डूबते ही जाना….
नमी के साथ कल-कल की आवाज,
रहस्मय अंधकार के उस पार उफनती नदी का अहसास।
शिराओं को नर्म स्पर्श करते हुये आगे बढ़ना
एक छोटी सी आवेग भरी धारा….
दूसरी..तीसरी…चौथी….फिर अनवरत निर्मल प्रवाह।
थकान से चूर मस्तिष्क और तपता हुआ शरीर
रोक देती है मुझे एक निश्चित बिंदू पर,
निर्झर के उदगम की ओर नहीं बढ़ पाना
असर्मथता ही तो है…
कहीं इस अनवरत तलाश में मैं खुद न खो जाऊं !!!!!!!

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