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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-3 (ओरछा)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 16, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन
रानी महल के झरोखे से चतुर्भुज मंदिर का दर्शन
व्यवस्था और अव्यवस्था

कालिदास का मेघदूत हम पर मेहरबान था। पूरे रास्ते मूसलाधार बारिश का मज़ा लेते दिन के साढ़े दस बजे हम ओरछा पहुंच गए थे। पर्यटन स्थल होने के नाते यह एक व्यवस्थित कस्बा है। टैक्सी स्टैंड के पास ही बाहर से आने वाले निजी वाहनों के लिए भी अलग से व्यवस्थित पार्किंग है। सड़क के दाईं ओर मंदिरों का समूह है और बाईं ओर महलों व अन्य पुरातात्विक भवनों का। मध्यकालीन स्थापत्य कला के जैसे नमूने यहां चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं, कहीं और मिलना मुश्किल है। सबसे पहले हम रामराजा मंदिर के दर्शन के लिए ही गए। एक बड़े परिसर में मौजूद यह मंदिर का$फी बड़ा और अत्यंत व्यवस्थित है। अनुशासन इस मंदिर का भी प्रशंसनीय है। कैमरा और मोबाइल लेकर जाना यहां भी मना है। दर्शन के बाद हम बाहर निकले और बगल में ही मौजूद एक और स्थापत्य के बारे में मालूम किया तो पता चला कि यह चतुर्भुज मंदिर है। तय हुआ कि इसका भी दर्शन करते ही चलें। यह वास्तव में पुरातत्व महत्व का भव्य मंदिर है। मंदिर के चारों तर$फ सुंदर झरोखे बने हैं और दीवारों पर आले व दीपदान। छत में जैसी नक्काशी की हुई है, वह आज के हिसाब से भी बेजोड़ है। यह अलग बात है कि रखरखाव इसका बेहद कमज़ोर है। इन दोनों मंदिरों के पीछे थोड़ी दूरी पर लक्ष्मीनारायण मंदिर दिखाई देता है। आसपास कुछ और मंदिर भी हैं। हमने यहां भी दर्शन किया।

चतुर्भुज मंदिर के बाईं तरफ़ है श्री रामराजा मंदिर

नीचे उतरे तो रामराजा मंदिर के दूसरे बाजू में हरदौल जी का बैठका दिखा। वर्गाकार घेरे में बना यह बैठका इस रियासत की समृद्धि की कहानी कहता सा लगता है। आंगन के बीच में एक शिवालय भी है। सावन का महीना होने के कारण यहां स्थानीय लोगों की का$फी भीड़ थी। इस पूरे क्षेत्र में अच्छा-ख़ासा बाज़ार भी है। यह सब देखते-सुनते हमें का$फी देर बीत गई। बाहर निकले तो 12 बज चुके थे। भोजन अनिवार्य हो गया था, लिहाजा रामराजा मंदिर के सामने ही एक ढाबे में भोजन किया।

जहांगीर महल
स्थापत्य के अनूठे नमूने

मंदिरों के ठीक सामने ही सड़क पार कर राजमहल थे। भोजन के बाद हम उधर निकल पड़े। मालूम हुआ कि यहां प्रति व्यक्ति दस रुपये का टिकट लगता है। कई विदेशी सैलानी भी वहां घूम रहे थे। इस किले के भीतर दो मंदिर हैं, एक संग्रहालय और एक तोपखाना भी। पीछे कई और छोटे-बड़े निर्माण हैं। अनुमान है कि ये बैरक, अधिकारियों के आवास या कार्यालय रहे होंगे। मुख्य महलों को छोड़कर बा$की सब ढह से गए हैं। सबसे पहले हम रानी महल देखने गए। मुख्यत: मध्यकालीन स्थापत्य वाले इस महल की सज्जा में प्राचीन कलाओं का प्रभाव भी सा$फ देखा जा सकता है।

जहांगीर महल के आंगन में बना हम्माम
इस महल में वैसे तो कई जगहों से चतुर्भुज मंदिर की स्पष्टï झलक मिल सकती है, पर एक ख़्ाास झरोखा ऐसा भी है जहां से चतुर्भुज मंदिर और रामराजा मंदिर दोनों के दर्शन किए जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी जगह से रानी स्वयं दोनों मंदिरों के दर्शन करती थीं। यह अलग बात है कि अब उस झरोखे वाली जगह पर भी कूड़े का ढेर लगा हुआ है। यह राजा मधुकर शाह की महारानी का आवास था, जो भगवान राम की अनन्य भक्त थीं और यहां स्थापित भगवान राम का मंदिर उनका ही बनवाया हुआ है। महल का आंगन भी बहुत बड़ा और भव्य है। बीचोबीच एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां रानी का दरबार लगता रहा होगा। जबकि राजमंदिर का निर्माण स्वयं राजा मधुकर शाह ने अपने शासनकाल 1554 से 1591 के बीच करवाया था।

इसके पीछे जहांगीर महल है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में मु$गल सम्राट जहांगीर के सम्मान में राजा बीर सिंह देव ने करवाया था। वर्गाकार विन्यास में बने इस महल के चारों कोनों पर बुर्ज बने हैं। जालियों के नीचे हाथियों और पक्षियों के अलंकरण बने हैं। ऊपर छोटे-छोटे कई गुंबदों की शृंखला बनी है और बीच में कुछ बड़े गुंबद भी हैं। हिंदू और मु$गल दोनों स्थापत्य कलाओं का असर इस पर सा$फ देखा जा सकता है और यही इसकी विशिष्टïता है। भीतर के कुछ कमरों में अभी भी सुंदर चित्रकारी देखी जा सकती है। कुल 136 कक्षों वाले इस महल के बीचोबीच एक बड़े से हौजनुमा निर्माण है। इसके चारों कोनों पर चार छोटे-छोटे कुएं जैसी अष्टकोणीय आकृतियां हैं। हालांकि इनकी गहराई बहुत मामूली है। अंदाजा है कि इसका निर्माण हम्माम के तौर पर कराया गया होगा।

जहांगीर महल से पीछे दिख रही बेतवा की ख़ूबसूरत घाटी

महल की छत से पीछे देखने पर पीछे मीलों तक फैली बेतवा नदी की घाटी दिखाई देती है। दूर तक फैली इस नीरव हरियाली के बीच कई छोटे-बड़े निर्माण और कुछ निर्माणों के ध्वंसावशेष भी थे। ध्यान से देखने पर बेतवा की निर्मल जलधारा भी क्षीण सी दिखाई दे रही थी। भीतर गाइड किसी विदेशी पर्यटक जोड़े को टूटी-फूटी अंग्रेजी में बता रहा था, ‘पुराने ज़माने महल के नीचे से एक सुरंग बनी थी, जो बेतवा के पार जाकर निकलती थी।’ आगे उसने बताया कि इस महल का निर्माण 22 साल में हुआ था और जहांगीर इसमें टिके सि$र्फ एक रात थे। राढ़ी जी गाइड के ज्ञान से ज्य़ादा उसके आत्मविश्वास पर दंग हो रहे थे।

ख़ैर, सच जो हो, पर ‘ओरछा’ का शाब्दिक अर्थ तो छिपी हुई जगह ही है। इसका इतिहास भी अद्भुत है। इसकी स्थापना टीकमगढ़ के बुंदेल राजा रुद्र प्रताप सिंह ने 1501 में की थी, पर असमय कालकवलित हो जाने के कारण वे निर्माण पूरा होते नहीं देख सके। एक गाय को बचाने के प्रयास में वे शेर के पंजों के शिकार हो गए थे। बाद में राजा बीर सिंह देव ने अपने 22 वर्षों के शासन काल में यहां के अधिकतर मनोरम निर्माण कराए। उन्होंने पूरे बुंदेल क्षेत्र में 52 किले बनवाए थे। दतिया का किला भी उनका ही बनवाया हुआ है। बाद में 17वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ही ओरछा के राजा मु$गल साम्राज्य से विद्रोह किया। फिर शाहजहां ने आक्रमण करके इस पर $कब्ज़ा कर लिया, जो 1635 से 1641 तक बना रहा। बाद में ओरछा राज्य को अपनी राजधानी टीकमगढ़ में करनी पड़ी।

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो…

महलों के बहाने कुछ देर तक अतीत में जीकर हम उबरे तो सीधे बेतवा की ओर चल पड़े। मुश्किल से 10 मिनट की पैदल यात्रा के बाद हम नदी के तट पर थे। महल की छत से दिखने वाली घाटी से भी कहीं ज्य़ादा सुंदर यह नदी है। नदी की अभी शांत दिख रही जलधारा के बीच-बीच में खड़े लाल पत्थर के टीलेनुमा द्वीप अपने शौर्य की कथा कह रहे थे या बेतवा के वेग से पराजय की दास्तान सुना रहे थे, यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था। यूं मुझे नाव चलाने का कोई अनुभव नहीं है, लेकिन इस पर नाव चलाना आसान काम नहीं होगा। पानी के तल के नीचे कहां पत्थर के टीलों में फंस जाए, कहा नहीं जा सकता। मैंने मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘बेतवा बहती रहीÓ का जिक्र किया तो राढ़ी जी कालिदास के मेघदूत को याद करने लगे-

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानीं


गत्वा सद्य: फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा।


तीरोपांत स्तनित सुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात्

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि।।

कालिदास का प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मित्र मेघ को रास्ते की जानकारी देते हुए कहता है- हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुंचेगा, तो तुझे वहां विलास की सब सामग्री मिल जाएगी। जब तू वहां सुहानी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीएगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।

बेतवा के घाट पर

बेतवा का ही पुराना नाम है ‘वेत्रवतीÓ और संस्कृत में ‘वेत्रÓ का अर्थ बेंत है। कालिदास का यह वर्णन किसी हद तक आज भी सही लगता है। प्रदूषण का दानव अभी बेतवा पर वैसा $कब्ज़ा नहीं जमा सका है, जैसा उसने अपने किनारे महानगर बसा चुकी नदियों पर जमा लिया है। इसके सौंदर्य की प्रशंसा बाणभट्टï ने भी कादंबरी में की है। वैसे वराह पुराण में इसी वेत्रवती को वरुण की पत्नी और राक्षस वेत्रासुर की मां बताया गया है। शायद इसीलिए इसमें दैवी और दानवीय दोनों शक्तियां समाहित हैं। गंगा, यमुना, मंदाकिनी आदि पवित्र नदियों की तरह बेतवा के तट पर भी रोज़ शाम को आरती होती है। लेकिन बेतवा की आरती में हिस्सेदारी हमारी नियति में नहीं था। क्योंकि हमें झांसी से ताज एक्सप्रेस पकडऩी थी, जो तीन बजे छूट जाती थी। मौसम पहले ही ख़्ाराब था। बूंदाबांदी अभी भी जारी थी। समय ज्य़ादा लग सकता था। लिहाजा डेढ़ बजते हमने ओरछा और बेतवा के सौंदर्य के प्रति अपना मोह बटोरा और चल पड़े वापसी के लिए टैक्सी की तलाश में।

                                                                      — इति–
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रामेश्वरम : बेहद अपने लगने लगे राम

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 31, 2010

हरिशंकर राढ़ी
कोडाईकैनाल से अपराह्नन चली हुई हमारी बस करीब साढ़े सात बजे मदुराई बस स्टैण्ड पर पहुँची तो झमाझम बारिश हो रही थी। बस से उतरे तो पता चला कि मित्र की जेब से बटुआ किसी ने मार लिया था। यह घटना हमारे लिए अप्रत्याशित थी। क्योंकि हमें विश्वास था कि दक्षिण भारत में ऐसा नहीं होता होगा। वैसे मुझे यह भी मालूम था कि मित्र महोदय बड़े लापरवाह हैं और उनकी अपनी गलती से भी बटुआ गिर सकता है। ऐसा एक बार पहले भी हुआ था, जब हम त्रिवेन्द्रम से मदुराई जा रहे थे। उस समय उनका बटुआ, जो पैंट की पिछली जेब में था और अधिकांश लोग ऐसे ही रखते हैं, गिरतेगिरते बचा था। मेरी पत्नी ने देख कर आगाह कर दिया था। बटुए में पैसा तो अधिक नहीं था किन्तु उनका परिचय पत्र, ड्राइविंग लाइसेन्स और एटीएम कार्ड था। हम सभी का परेशान होना तो स्वाभाविक था ही। तलाश प्रारम्भ हुई और अन्ततः निराशा पर समाप्त हुई। किन्तु पता नहीं क्यों मुझे बारबार ऐसा लग रहा था कि जेब किसी ने मारी नहीं है, अपितु पर्स लापरवाही से ही कहीं गिर गया होगा और मैं अकेले ही सोचता और गुनता रहा। अचानक मुझे लगा कि क्यों बस के नीचे देखा जाए। बस अभी भी वहीं खड़ी थी। उतरते समय उसमें गजब की भीड़ थी। जब मैंने बैठकर बस के नीचे देखा तो लगा कि कोई पर्स जैसी चीज है। एक दो मिनट बाद ही बस वहां से चल दी। मैंने लपक कर बटुआ उठा लिया और विजयी भाव से उनके पास आया। बटुआ तो उन्हीं का था। देखा गया तो पैसे निकाल लिए गए थे, किन्तु बाकी जरूरी कागजात उसमें मौजूद थे। सबने राहत की साँस ली, जैसे खोई हुई खुशी लौट आई।
बस स्टैण्ड से ऑटो कर के हम रेलवे स्टेशन पहुँचे और मालूम किया तो साढ़े ग्यारह बजे रात्रि की पैसेन्जर उपलब्ध थी। अभी लगभग आठ ही बज रहे थे। आराम से टिकट वगैरह लेकर आईआरसीटीसी के रेस्तरां में भोजन लिया और कुछ देर आराम करके गाडी की ओर गए। पूरी की पूरी ट्रेन जनरल ही है। ऊपर की बर्थ पर हम लोग आराम से फैल लिए हमारा अन्दाजा था कि सुबह चारपाँच बजे तक पहुँचेंगे गाडी कब चली, हमें पता ही नहीं चला। हाँ, दक्षिण की पैसेन्जर गाडियों में भी टिकट की जाँच बडी ईमानदारी से होती है, ये हमें जरूर पता लग गया। हम गहरी नींद में ही थे कि शोर हुआ, जागे तो पता चला कि हम पुण्यधाम रामेश्वरम पहुंच चुके हैं। अभी रात के ढाई ही बज रहे थे।
प्लेटफॉर्म पर स्थिर होते तीन बज चुके थे इतनी रात में वहाँ से जाना या होटल तलाशने के विषय में सोचना भी उचित नहीं था। अतः सुबह होने तक वहीं रुके रहना ही ठीक लगा। उत्तर भारत की तरह वहाँ भीडभाड का साम्राज्य तो था नहीं, अतः वहीं प्लेटफॉर्म पर ही आसन लग गया। चादरें निकाली गईं और लोग फैल गए। मुझे ऐसे मामलों में दिक्कत महसूस होती है। अनजान सी जगह पर घोडे बेच कर सोना मुझे सुहाता। इसलिए पास ही पडी कुर्सी पर बैठ गया और बोला कि आप लोग सोइए, मैं तो जागता ही रहूंगा।
कुर्सी पर बैठाबैठा मैं खयालों में डूब गया। यही रामेश्वरम है, जहाँ आने की जाने कब की इच्छा फलीभूत हुई है। शायद प्रागैतिहासिक काल की बात होगी जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम हजारों मील की यात्रा करके यहाँ पहुँचे होंगे। कहाँ अयोध्या और कहाँ रामेश्वरम! अयोध्या का अस्तित्व तो तब बहुत ठोस था, किन्तु रामेश्वरम का तो अतापता भी नहीं रहा होगा! राम आते और रामेश्वरम बनता। सागर का एक अज्ञात किनारा ही रह जाता! अयोध्या से चलकर भटकतेभटकते, पैदल ही यहाँ पहुँचे होंगे। आज मैं भी उन्हीं की अयोध्या से ही आया हूँ। और लगा कि राम कितने अपने हैं। क्षेत्रीयता का पुट या अभिमान, जो भी कहें, मुझे महसूस होने लगा। आज कितनी सुविधाएँ हो गई हैं ! एक कदम भी पैदल नहीं चलना है और मैं राम की अयोध्या से उन्हीं के इष्ट देव भगवान शिव और उनकी स्वयं की कर्मभूमि रामेश्वरम में बैठा उन्हीं के विषय में सोच रहा हूँ। सचमुच उन्होंने उत्तर को दक्षिण से जोड़ दिया। संस्कृति को एकाकार कर दिया। उस राम की असीम कृपा ही होगी कि उनके पौरुष, आस्था और सम्मान की भूमि का स्पर्श करने उसे प्रणाम करने का अवसर प्राप्त हो पाया है। धन और सामर्थ्य में तो मैं लोगों से बहुत ही पीछे हूँ।
बैठेबैठे ही मेरा मन बहुत पीछे चला गया। कैसा समय रहा होगा राम का जब वे यहाँ आए होंगे? क्या मानसिकता रही होगी उनकी? अपने राज्य से परित्यक्त, पत्नी के वियोग में व्याकुल और स्वजनों से कितनी दूर? अपनी जाति और सामाजिक व्यवस्था से बिलकुल अलग, सर्वथा भिन्न बानरों की सेना लिए और मित्रता की डोर पकड़े उस महाशक्तिशाली मायावी दशानन रावण से टक्कर लेने यहाँ तक पहुँचे! यहाँ आकर उसी शिव का सम्बल लिया जिसका वरदहस्त पाकर ही रावण अजेय बना हुआ था। किन्तु शिव तो सदैव सत्य के साथ होता है, चाटुकारिता और उत्कोच के साथ नहीं। कितना सुन्दर संगम हुआ सत्य और शिव का यहाँ ! यही है वह रामेश्वरम और धन्य है मेरे जीवन का यह क्षण जब मैं (एक अयोध्यावासी) अपने राम के पद चिह्नों की रज लेने का अवसर प्राप्त कर पाया हूँ।
भोर की पहली किरण के साथ मैंने सबको जगाया और सामान समेट कर स्टेशन से बाहर गए। दो ऑटो किए गए और मंदिर की ओर प्रस्थान किया। यहाँ भी हमारी प्राथमिकता थी कि कोई होटल लेकर सामान पटकें, नहाएं धोएं और तब मंदिर की ओर चलें। ऑटो वाले ने खूब घुमाया और अपने स्तर पर होटल दिलाने का पूरा प्रयास किया। अब उसने इतना प्रयास क्यों किया, ये तो सभी ही जानते हैं। या तो कमरा सही नहीं, या फिर किराया बहुत ज्यादा! इधरउधर घूमने के बाद मैंने उसे नमस्ते किया और अपने तईं ही कमरे का इंतजाम करने की ठानी। बहुत जल्दी ही हमें एक होटल मंदिर के पीछे मुख्य सड़क पर ही मिल गया। हमने तुरन्त ही दो कमरे बुक कर लिए। रामेश्वरम में, मुझे ऐसा बाद में लगा, तीनचार सौ में डबल बेड के कमरे बडे आराम से मिल जाते हैं। वैसे वहाँ ठहरने के लिए सर्वोत्तम स्थान गुजरात भवन है जो मंदिर के मुख्य द्वार के बिलकुल पास है। यहाँ व्यवस्था अच्छी है और किराया मात्र दो सौ पचास रुपये।

सागर के खारे जल की बात तो और होती ही है, किन्तु यहां के जल में जो सबसे बडी समस्या हमें दिख रही थी वह थी गन्दगी। पानी बिलकुल डबरीला और अनेक प्रकार के प्रवहमान एवं स्थिर पदार्थों से युक्त था।

होटल में सामान जमाने के बाद हम सागर में स्नान के लिए निकल पडे। यहाँ आने की योजना बनाते समय ही मैंने ये मालूम कर लिया था कि सर्वप्रथम यहाँ मंदिर के मुख्य गोपुरम के सम्मुख बंगाल की खाडी में और तदुपरान्त उन्हीं गीले कपडों में मंदिर में स्थित बाईस कुंडों में स्नान करने की परम्परा और प्रावधान है। सागर के खारे जल की बात तो और होती ही है, किन्तु यहां के जल में जो सबसे बडी समस्या हमें दिख रही थी वह थी गन्दगी। पानी बिलकुल डबरीला और अनेक प्रकार के प्रवहमान एवं स्थिर पदार्थों से युक्त था। हाँ, पर इतना गंदा भी नहीं था कि घिन हो जाए या इतनी दूर से चलकर आने वाले की आस्था धरी की धरी ही रह जाए और वह तथाकथित कर्मकांड से सहज ही विमुख हो जाए। अंततः हम सबने भी हिम्मत बटोरी और बचतेबचाते उस डबरीले सागर में घुस गए।
अरब सागर के उस खारे पानी में नहा कर निकले तो अगला क्रम मंदिर के अन्दर बाईस कुण्डों में नहाने का था। वहाँ से गीले कपड़े में हम मंदिर की ओर चले ही थे कि कई पंडे हाथों में बाल्टी और रस्सी पकडे हमारी तरफ लपके और हमें नहला देने का प्रस्ताव करने लगे। इतने में हम मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार पर पहुँचे। यहाँ कुछ और सेवकों ने घेरा डाला। उनका कहना था कि वे हर सदस्य को पूरी बाल्टी भर कर हर कुंड पर नहलाएंगे और सौ रुपये प्रति सदस्य लेंगे। पचास रुपये तो प्रवेश शुल्क और सरकारी फीस ही है। यह बात सच थी कि प्रवेश शुल्क पचीस रुपये प्रति व्यक्ति था और नहलाने का भी उतना ही। सत्तर रुपये में बात लगभग तय ही होने वाली थी कि मेरे मित्र महोदय को चिढ गई और वे सरकारी नियम के अन्तर्गत प्रवेश लेने चल पडे। उन्हें नियम विरुद्ध कोई भी बात जल्दी अच्छी नहीं लगती और अपने देश की व्यवस्था में वे अकसर फेल हो जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। साथ निभाने के लिए मुझे भी पीछेपीछे चलना पड़ा, हालाँकि मैं जानता था कि हमें अन्दर जाकर दिक्कत होगी।
टिकट लेकर प्रवेश किया तो पहले कुंड पर एक सेवक खडा मिल गया। कुंड का मतलब यहाँ कुएँ से है। ऐसे ही गहरेगहरे बाईस कुएँ यहाँ हैं जिनके जल से नहाने की यहाँ परम्परा है। कुल मिलाकर हम आठ सदस्य थे और आगे परेशानी शुरू होनी थी, हुई। सभी कुएँ एक जगह नहीं बल्कि दूरदूर हैं। दो चार कुंडों के बाद नहलाने वाले सेवक भारतीय व्यवस्था के अनुसार नदारद! अधिकांश बाहर से ही यजमान पटा कर ले आते हैं और उन्हें ही नहलाने में व्यस्त रहते हैं। हम तो जैसे जनरल वार्ड के मरीज हो रहे थे। मुझे मित्र पर मन ही मन गुस्सा भी रहा था। अंततः एक ग्रुप के साथ ही हम भी लग गए। उससे हमारी सुविधा शुल्क की शर्त पर सेटिंग हो गई। अगर आपको कभी जाना हो और इस धार्मिक कर्मकांड का भागी बनना हो तो आप भी किसी पंडे से मोलभाव कर ठेका छोड दें। सुखी रहेंगे।
वैसे यहाँ कुंडों में स्नान करना अच्छा लगता है।

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